Header Ads

विशेष : दार्जिलिंग में दम दिखाने को तैयार GSSS, गोरखा जनसमर्थन के बूते गोरखालैंड की मांग पर अडिग


वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क
दीपक राई
गोरखालैंड संयुक्त संघर्ष समिति यानी (GSSS) अब दार्जिलिंग में अपना दम दिखाने को तैयार है। क्या इस बार गैर-राजनीतिक पार्टी या यूं कहे कि संस्था के रूप में GSSS को पहाड़ की जनता का विश्वास मिल पाएगा या नहीं। अभी तक दिल्ली में जंतर-मंतर में लगातार गोरखालैंड पृथक राज्य की एकसूत्रीय मांग पर डटी हुई GSSS टोली 8 तारीख को दार्जिलिंग के चौरास्ता में पूर्ण रुप से जनसंपर्क रूपी एक महासभा का आयोजन करने जा रही है। अभी तक दार्जिलिंग के पहाड़वासी वर्तमान परिदृश्य में कई राजनीतिक पार्टियां होने के बावजूद उन पर धीरे-धीरे अपना विश्वास कम दिखाती जा रही है। हाल ही में कल के बेहद अशोभनीय घटना क्रम में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष एवं उनकी टीम के साथ की गई मारपीट से यह भी स्पष्ट संकेत मिलने लगा है कि पहाड़ की राजनीति में अब बेहद जटिलता उत्पन्न हो गई है। पहाड़ की जनता किसी भी सूरत में अब किसी भी राजनीतिक पार्टी कुछ सपोर्ट देने के मूड में दिखाई नहीं दे रही है, शायद इसी वजह से GSSS की टोली को पहाड़ में एक नया जनाधार मिलने की उम्मीद हो। दार्जिलिंग में आयोजित होने वाली GSSS की आम जनसभा कई मायनों में महत्वपूर्ण भी हो चुकी है क्योंकि पहाड़ की जनता अब किसी भी कीमत पर गोरखालैंड पृथक राज्य से कम नहीं चाहती है और फिलहाल GSSS ने इसी को अपना एकसूत्रीय मुद्दा बनाया है। इसलिए हो सकता है की पहाड़ की जनता GSSS को हाथों-हाथ ले। इसके अलावा पहाड़ में एक अन्य गैर-राजनीतिक संस्था नेशनल गोरखालैंड कमेटी यानी एनजीसी भी अपनी पैठ आतुर नजर आ रही है। कल सिलीगुड़ी में एनजीसी ने एक बैठक भी आयोजित की। जिसमें गोर्खाली जनरल शक्ति गुरुंग की उपस्थिति में एनजीसी को अधिक वजनदार बना दिया है, हालांकि एनजीसी को अभी भी आम जनता का समर्थन हासिल नहीं है। एनजीसी में अभी भी केवल हाई क्लास गोर्खाली ही शामिल है एवं इन्हीं को बौद्धिक रूप से आगे बढ़ाकर एनजीसी गोरखालैंड प्राप्ति करना चाहती है।

GSSS बनाम एनजीसी में एक तुलनात्मक आकलन
गोरखालैंड संयुक्त संघर्ष समिति एवं नेशनल गोरखालैंड कमेटी दोनों ही गैर राजनीतिक संस्था है एवं दोनों ही पृथक गोरखालैंड राज्य प्राप्ति के लिए अपनी कोशिश कर रही है लेकिन यदि दोनों में तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो एनजीसी अभी भी केवल एलीट क्लास गोर्खाली समाज के तौर पर आंदोलन में प्रतिनिधित्व कर रहा है। इसमें अभी भी आम गोर्खाली जनता का विश्वास जीतने के लिए लंबी यात्रा करनी पड़ेगी वहीं दूसरी ओर GSSS लम्बे समय से पृथक गोरखालैंड राज्य के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर में भारी आम गोर्खाली जनता के सहारे ही इस आंदोलन को अभी तक जीवित बनाए हुए हैं। GSSS के पक्ष में गोरखालैंड प्रेमियों की अच्छी खासी तादाद का समर्थन सबसे बड़ी वजह है जिससे यह आने वाले दिनों में पहाड़ में एक नया जन लहर पैदा कर सकती है।

GSSS बढा सकती है पहाड़ की राजनीतिक पार्टियों की मुसीबतें !
8 अक्टूबर को GSSS की दार्जिलिंग के चौरास्ता में आयोजित होने वाली गोरखालैंड राज्य के समर्थन में आम जनसभा को मिलने वाला जनसमर्थन आने वाले समय में पहाड़ की राजनीतिक पार्टियों में चिंता की एक नई लकीर खींच सकती है। इसके पीछे एक ठोस वजह यह है कि गोरखालैंड पृथक राज्य के लिए पिछले 110 दिनों से पहाड़ की राजनीतिक पार्टियां खामोश बैठी हुई है एवं उनकी चुप्पी कहीं ना कहीं काउंसिल के लिए उनकी मौन स्वीकृति की तरफ इशारा कर रही है। अब दार्जिलिंग के हालात बिल्कुल बदल चुके हैं, यहां पर अब ना तो सुभाष घीसिंग के काल का और ना ही विमल गुरुंग  के काल का राह गया है। अभी भी गोरखालैंड के लिए लोगों में भारी जनसमर्थन नजर आ रहा है। इसके पीछे भी एक साधारण सी बात है वह यह है कि अब दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र के आम गोर्खाली जनता हर हाल में काउंसिल और स्वार्थ पूर्ति के लिए कोलकाता और दिल्ली का मुंह ताक रही राजनीतिक पार्टियों को नकारने के मूड में है जनता अब पहाड़ में एक स्थाई समाधान चाहती है जिसके लिए वह पूर्ण रुप से दृढ़ संकल्पित है।

आखिर क्यों 110 साल से दार्जिलिंग का समाधान बनी एक समस्या
दार्जिलिंग पहाड़ की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति पर नजर दौड़ाएं तो यहां पर रहने वाले आम गोर्खाली तबके को लंबे समय तक शोषित रखा गया है एवं गोरखालैंड के नाम को केवल एक तुष्टिकरण का साधन बना कर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता रहा है। संपूर्ण पश्चिम बंगाल राज्य के राजस्व में 21 फ़ीसदी देने वाला पर्वतीय क्षेत्र अभी भी बेहद पिछड़ा हुआ है, आखिर क्यों ? इसके पीछे गोर्खाली राजनीतिक पार्टियों के आपसी स्वार्थ एवं आपसी मतभेद सबसे प्रमुख कारण रहे हैं। इन सभी ने पर्वतीय क्षेत्र की समस्या का निदान खोजने का प्रयास ईमानदारी से कभी किया ही नही है। अब सवाल यह है कि क्या गोरखालैंड राज्य बनाना इतना मुश्किल है ? यदि इतना ही मुश्किल है तो यहां की राजनीतिक पार्टियां आखिरकार क्यों जनता को गोरखालैंड के नाम पर भ्रमित करती आई है ? यदि वाकई राज्य का गठन संभव है तो उसके अलावा दूसरे विकल्प पर विचार क्यों किया जाता रहा है ? अभी भी पहाड़ की शीर्ष राजनीतिक पार्टियां काउंसिल लेने के लिए तत्पर दिखाई दे रही है। इसका स्पष्ट संकेत यह भी है कि गोरखालैंड राज्य की मांग एक छलावा है, यदि यह छलावा है तो इस छलावे का इस्तेमाल आखिरकार समस्त दुनियाभर के गोर्खाली समाज को उनके अस्तित्व की जंग के तौर पर क्यों दिखाया जाता रहा है ? वहीं दूसरी ओर संविधान के नियम के अनुसार गोरखालैंड राज्य की मांग पर नजर डाला जाए तो यह पूर्ण रूप से मुमकिन नजर आता है। भारत के संविधान के अंतर्गत आर्टिकल 3 में स्पष्ट रूप से राज्य के पुनर्गठन की बात की गई है और यही वजह है जिसके कारण संपूर्ण भारतवर्ष के गोर्खाली समाज ने गोरखालैंड राज्य की परिकल्पना को अपनी आवश्यकता माना है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्होंने दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में लंबे समय से कई राजनीतिक आकाओं को जन्म दिया है एवं राजनीतिक आकाओं ने समय समय के साथ केवल गोरखालैंड को एक झुनझुना के तौर पर ही अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है।

Powered by Blogger.