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सम्पादकीय : गोरखालैंड आंदोलन में बंगाल सरकार की दमन के खिलाफ "महान प्रतीक" बने वीर शहीद बरुण भुजेल


दीपक राई
कोलकाता के पीजी अस्पताल में 24 अक्टूबर की देर रात बंगाल सरकार की गोरखालैंड के प्रति हैवानियत में सारी मर्यादाओं को लांघते हुए एक नई परिभाषा गढ़ दी। इस निर्मम परिभाषा ने गोरखालैंड के एक वीर सपूत की जान ले ली है। कालिम्पोंग नगर पालिका के वार्ड नंबर 16 के दिवंगत कमिश्नर बरुण भुजेल की तस्वीर अब महज तस्वीर नहीं बल्कि गोरखालैंड आंदोलन का "महान प्रतीक चिन्ह" बन चुका है। भुजेल की यह तस्वीर अब बंगाल सरकार की दमन को मुंह चिढ़ाता हुआ,गोरखालैंड के लिए एक सच्चे गोरखा की दृढ़ संकल्प और मजबूत इरादे दर्शाता हुआ, हमेशा के लिए अमर हो गया। भुजेल ने साबित किया कि गोरखा कभी मौत से डरता नहीं है। कभी फील्ड मार्शल मानेक शॉ ने कहा था,' यदि कोई कहता है कि वह मौत से नहीं डरता तो वह झूठ बोल रहा है या वह कोई गोरखा है। इसी बात को बरुण भुजेल के बंगाल सरकार के खिलाफ लगातार गोरखालैंड राज्य के समर्थन में अडिग रहकर अब गोरखालैंड आंदोलन की दिशा ही बदल दी है। अब गोरखालैंड आंदोलन दुनियाभर में बंगाल सरकार के दमन और उसकी सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का एक जीता जागता उदाहरण बन चुका है। साथ ही यह सच्चे हिंदुस्तानियों द्वारा किया जा रहा एक संवैधानिक युद्ध भी बन चुका है। जिसमें एक तरफ देश के संविधान में अटूट श्रद्धा रखते हुए उसकी आस्था पर यकीन रखते हुए, विश्व के संपूर्ण गोर्खाली समुदाय एक तरफ पृथक राज्य के लिए आंदोलन कर रहे है और वहीं दूसरी ओर संविधान की कसम खाकर राजपाट करने वाले एक सरकार की असंवैधानिक तरीके से किए जा रहे निर्मम दमन की जिंदा मिसाल अब गोरखालैंड आंदोलन दुनिया के सामने रह गया है। 

क्या गोरखालैंड की मांग अब बंगाल सरकार के लिए देशद्रोह की वजह है ?
समूचे देश में मौलिक अधिकारों की दुहाई देती हुई बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को क्या देश के सम्मानीय गोरखा नागरिकों के मौलिक अधिकारों की तनिक भी चिंता है ? आखिरकार देश में राज करने वाला सच्चा शासक वह है, जो अपनी प्रजा के दुख दर्द एवं उनकी चिंताओं का निराकरण करें। पश्चिम बंगाल की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भी अब गोरखालैंड की मांग से सहमत दिखने लगा है लेकिन कोलकाता में बेटी पश्चिम बंगाल की सरकार अभी भी केवल "गनतंत्र" के बूते पहाड़ में शांति तलाश रही है जो बेवकूफाना है। पहाड़ की गोरखालैंड प्रेमी जनता पश्चिम बंगाल के बंगाली जनमानस का दिल से सम्मान करती है। साथ ही उनको बड़ा भाई मानते हुए उनसे एक जायज अधिकार की मांग भी करता है। जिसे काफी हद तक पहाड़ के गोरखाओं के प्रिय दादा बाबू मोशाय जनता समर्थन भी जता रही है। वहीं पहाड़ के हर घर से भुजेल के रूप में बंगाल सरकार के दमन का डटकर सामना करने के लिए वीर संतान देश की संविधान और मर्यादा को सर्वोच्च मानकर पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक सत्याग्रह करने के लिए अब आतुर है

आखिर गोरखालैंड प्रेमी भुजेल की गलती क्या थी ?
बंगाल पुलिस की हिरासत में जिस तरह भुजेल की दर्दनाक मौत हुई, उससे यह स्पष्ट हो गया की ममता सरकार के इरादे क्या है। भुजेल भी किसी का बेटा, किसी का पति, किसी का भाई और किसी का पिता भी था। इस भावनात्मक मुद्दे को कोई झुठला नहीं सकता लेकिन भुजेल ने गोरखालैंड राज्य की मांग को सर्वोपरि रखते हुए गोर्खाली समुदाय के लिए अपने जीवन की ना भुलाया जाने वाला बलिदान दिया है। भारतवर्ष के सच्चे गोरखे संतान बरुण भुजेल गोर्खाली समाज के लिए कालांतर तक अमर रहेंगे। आज वह गोरखालैंड आंदोलन की सबसे बड़े प्रतीक के रूप में दुनियाभर में भी पहचाने जाने लगे हैं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आप कब समझेंगे किसी की जीवन का मोल
इस साल 2017 में गोरखालैंड राज्य की मांग करते हुए दर्जनों जाने जा चुकी है।जिसके लिए कहीं ना कहीं अपरोक्ष रूप से बंगाल सरकार जिम्मेदार रही है। क्या राज्य की मुख्यमंत्री के ऊपर इतना अहम सवार है कि वह भूल गई कि जीवन का मोल क्या है। क्या वह यह भी भूल गई कि मरने वाले उसके ही राज्य की सीमाओं के भीतर रहने वाले मासूम नागरिक थे। ममता बनर्जी को अब ज्यादा दिनों तक दमन की नीति को ना अपनाते हुए अब गोरखालैंड राज्य की स्थाई समाधान के लिए एक दयालु बंगाली मनुष्य की तरह ईमानदारी से प्रयास करना चाहिए।

गोरखालैंड के गठन से ममता को बंगाल के नागरिकों से भी मिलेगी प्रशंसा
संपूर्ण भारतवर्ष में बंगाल के लोग सबसे बुद्धिमान और बड़े दिलवाले समझे जाते हैं। यही वजह है कि गोरखालैंड आंदोलन का विरोध हमेशा राज्य की सरकार करती रही है ना कि राज्य की बंगाली जनता। कहीं-न-कहीं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह डर सताता है कि यदि गोरखालैंड राज्य का गठन कर दिया तो बंगाल की जनता से उनका जनाधार समाप्त हो जाएगा। लेकिन असल में ऐसा है नहीं। बंगाल की जनता सदैव गोरखालैंड के पक्ष में नरम रहा है, इसलिए बहुत कुछ मुमकिन है कि गोरखालैंड राज्य निर्माण के बाद भी ममता बनर्जी का जनाधार जस का तस बना रहे क्योंकि बंगाल के बड़े दिलवाले नागरिक देश में मौलिक अधिकार की बातों से अच्छी तरह वाकिफ है। अब इसलिए ममता बनर्जी को इस व्यर्थ की चिंता से दूर होकर गोरखालैंड राज्य के लिए विधानसभा में एक विशेष प्रस्ताव लाकर उसमें समग्र चर्चा करने की पहल करनी चाहिए।

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