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मधेसियों का नेपाल सरकार को 7 दिन का अल्टीमेटम, मारे गए लोगों को ‘शहीद’ घोषित करने की मांग


कमल प्रसाद घिमिरे
काठमांडू :
नेपाल में आंदोलनरत मधेसी समूह ने प्रधानमंत्री प्रचंड को बुधवार (8 मार्च) को अंतिम चेतावनी दी कि अगर एक सप्ताह के भीतर उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक मधेसी फ्रंट (यूडीएमएफ) ने मंगलवार (7 मार्च) को बालुवाटर में प्रधानमंत्री के आवास पर एक बैठक के दौरान प्रचंड को पांच सूत्री ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में मधेसी नेताओं ने स्थानीय चुनाव कार्यक्रम को वापस लेने, संसद में संविधान के संशोधित विधेयक पर चर्चा करने और सप्तरी में पुलिस गोलीबारी की जांच कराने की मांग की। साथ ही उन्होंने गोलीबारी की घटना में दोषी पाये जाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग भी की।

मधेसी नेताओं ने सरकार से कहा कि इस घटना में मारे गये लोगों को ‘शहीद’ घोषित किया जाए और उनके परिजनों के लिए बकाया मुआवजे की मांग की। बैठक के बाद यूडीएमएफ द्वारा जारी किये गये बयान के अनुसार फ्रंट ने चेतावनी दी कि अगर एक सप्ताह के भीतर उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे। इस बीच सप्तरी में पुलिस गोलीबारी में मारे गये लोगों की संख्या बढ़कर चार पर पहुंच गयी है। मधेसी फ्रंट की दो दिवसीय हड़ताल से लगातार दूसरे दिन नेपाल के दक्षिणी इलाके के 20 जिलों में जनजीवन बाधित रहा। मधेसियों ने संविधान के लागू होने के खिलाफ छह महीने लम्बा आंदोलन चलाया था। वे और अधिक प्रतिनिधित्व और राज्य की सीमाओं का फिर से सीमांकन किये जाने की मांग को लेकर संविधान के प्रावधानों में संशोधन की मांग कर रहे हैं।

विधेयक का समर्थन करने से इनकार, बताया ‘पक्षपातपूर्ण’
नेपाल के मधेसी फ्रंट ने संविधान संशोधन विधेयक को समर्थन देने से इनकार करते हुए कहा कि यह पक्षपातपूर्ण है और मौजूदा रूप में स्वीकार्य नहीं है। इससे प्रधानमंत्री प्रचंड के उन समूहों के साथ सुलह संबंधी प्रयासों को झटका लगा है, जो इस नए कानून का विरोध कर रहे हैं। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक मधेसी फ्रंट (यूडीएमएफ) और फेडरल सोशलिस्ट फोरम-नेपाल (एफसीएफ-एन) ने अपने बयान में कहा है कि वो इस संविधान संशोधन विधेयक को स्वीकार नहीं कर सकते, जिसे संसद में नेपाली सरकार ने विपक्ष सीपीएन-यूएमएल के विरोध के बावजूद सूचिबद्ध कराया है। यूडीएमएफ ने बुधवार (30 नवंबर, 2016) को एक बयान में कहा, ‘हम इस विधेयक को स्वीकार नहीं कर सकते, जिसे नेपाली सरकार ने संसद में एकतरफा ही सूचिबद्ध कराया है। हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं क्योंकि यह मधेसियों, जनजातियों और वंचित तबकों से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं देता है।’

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