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संयुक्त राष्ट्र से कतर को मिली 21 लाख भारतीय-नेपाली मजदूरों से दुर्व्यवहार को रोकने की मिली डेडलाइन


कतर : संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने कहा है कि अपनी जांच बैठाने से पहले वह कतर को नवंबर तक का समय दे रहा है. इस अरब देश पर जबरन मजदूरी कराने और प्रवासी मजदूरों के श्रमिक अधिकारों का हनन करने के आरोप लगते रहे हैं. कतर की 25 लाख की कुल आबादी में करीब 90 फीसदी लोग भारत, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों से पहुंचे प्रवासी कामगार है. इनमें से कई बहुत ही कम कमाई वाले कंस्ट्रक्शन के काम में लगाए जाते हैं. यह लोग 2022 में कतर में होने वाले फीफा विश्व कप के लिए स्टेडियम और अन्य इमारतों का निर्माण कर रहे हैं. हाल के सालों में सामाजिक कार्यकर्ताओं और श्रम संगठनों ने कतर के खिलाफ मजदूरों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें की हैं. उन्होंने पाया है कि मजदूरों को बहुत ही खराब आवासों में रखा जाता है, उनकी सेहत और सुरक्षा का स्तर भी काफी नीचे है, कई बार उनका वेतन रोक दिये जाने और पासपोर्ट जब्त कर लिये जाने की भी शिकायतें सामने आती हैं.

आईएलओ ने कहा है कि कतर सरकार ने प्रवासी मजदूरों का हाल सुधारने के लिए हाल में कुछ कदम उठाये हैं लेकिन उन्हें इस बारे में और जानकारी चाहिए कि अरब देश अपने यहां कैसे श्रम सुधार लाने पर काम कर रहा है. अपनी रिपोर्ट में आईएलओ ने लिखा, "गवर्निंग बॉडी ने कतर सरकार से लगातार इस बारे में जानकारी भेजने के लिये कहने का निर्णय लिया है. यह जानकारी कि प्रवासी मजदूरों के देश में प्रवेश, निकास और निवास को लेकर (श्रम सुधार) कानून को लागू करने के लिए कैसे कदम उठाये जा रहे हैं." इसके अलावा आईएलओ ने देश में मौजूद घरेलू नौकरों की हालत में सुधार लाने की भी मांग की है. नवंबर में होने वाली आईएलओ की अगली बैठक में तय किया जाना है कि कतर में इन सभी कामगारों के साथ हो रहे गलत बर्ताव की जांच कराने के लिए जांच आयोग का गठन किया जाएगा या नहीं. कतर की ओर से अब तक इस मसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पायी है.

हाल के सालों में नेपाल से विदेशों में काम के लिए जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ कर दोगुनी हो गई है क्योंकि सरकार विदेशी श्रम को बढ़ावा दे रही है. 2008 में जहां दो लाख 20 हजार लोग नेपाल से विदेशों में काम करने गए, वहीं 2105 में इनकी संख्या बढ़ कर पांच लाख हो गई. लेकिन इसी अवधि में विदेशों में मौत का शिकार होने वाले नेपाली कामगारों की संख्या भी बहुत से तेजी से बढ़ी है. 2008 में प्रति ढाई हजार कामगारों में से एक की मौत हुई, जो कि 2015 में बढ़ कर प्रति 500 मजदूरों पर एक मौत तक चला गया. गैस के अकूत भंडार पर बैठे  अमीर अरब देश कतर में कफाला सिस्टम चलता था. बीते दिसंबर में ही इसे खत्म कर नए कानून बनाये गए हैं. कफाला के अंतर्गत प्रवासी मजदूर नौकरी नहीं बदल सकते थे और अपने रोजगारदाता की मर्जी के बिना देश भी नहीं छोड़ सकते थे. आईएलओ ऐसी ही बंधुआ मजदूरी जैसी व्यवस्था में सुधार लाने और जल्द से जल्द उन्हें लागू करने की मांग करता रहा है.

दिसंबर में कतर ने नया कानून बना कर ऐसे लोगों को नौकरी बदलने का अधिकार दे दिया था, जिनके कॉन्ट्रेक्ट की अवधि पूरी गयी हो. इसके अलावा कानून में उन नौकरी देने वालों पर जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है, जो अपने कर्मचारियों का पासपोर्ट जब्त करें. सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि नये श्रम कानून काफी नहीं हैं. प्रवासी मजदूरों को अब भी कॉन्ट्रैक्ट के दौरान नौकरी बदलने के लिए अपने पहली कंपनी से अनुमति लेनी पड़ती है, जिसमें पांच साल तक का लंबा समय लग सकता है. अगर अनुमति लिए बिना वे ऐसा करते हैं तो उन पर आपराधिक मुकदमे हो सकते हैं, जिनके अंतर्गत मजदूरों को गिरफ्तार किया जा सकता है, हिरासत में रखा जा सकता है या देश से निर्वासित किया जा सकता है.



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