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ओलंपिक : गोरखा बॉक्सर शिव थापा की असली ताकत बनेगा उनका संघर्ष, जानिए कैसा रहा उनका स्ट्रगल


गुवाहाटी : घर के पास एक छोटे से ट्रेनिंग सेंटर से शुरू हुआ सफर आज ओलिंपिक रिंग तक पहुंच गया है। पिता का जुनून ऐसा कि, जो वो खुद न कर सके वो सपना उनका बेटा जी रहा है। हम बात कर रहे हैं इंडिया के स्टार बॉक्सर शिव थापा (56 kg वेट कैटेगरी) की। भारत के गोरखा बॉक्सर शिव थापा रियो ओलिंपिक में भारत की सबसे बड़ी पदक उम्मीद हैं।

पिता की कहानी दिलचस्प, जब खेल बना जुनून...
शिव के पिता पद्म थापा गुवाहाटी के जिस क्षेत्र में रहते थे वो लोकल गैंग्स की लड़ाई के लिए फेमस था। आए दिन किसी न किसी बात पर गुटों में विवाद आम बात थी। ऐसी ही एक गैंग में पद्म भी शामिल थे। मजबूत होने के लिए उन्होंने मणिपुर के एक कराते ट्रेनर को अपने घर के पास एकेडमी शुरू करने के लिए कहा। पद्म और उनके कुछ दोस्त एकेडमी ज्वाइन करने वालों में सबसे पहले थे। दूसरे गुट से अपनी रक्षा के लिए सीखी गई कला जल्द ही पद्म का शौक बन गई। उन्होंने इसे सीरियसली लिया और दो नेशनल चैम्पियनशिप में हिस्सा भी लिया, लेकिन मेडल नहीं जीत सके। सफलता नहीं मिलने पर चैम्पियनशिप में जाना बंद किया और ठान लिया कि अपने बेटों को ओलिंपिक चैम्पियन बनाएंगे।

सपना देखा, पर पता नहीं थीं दो बातें
कम उम्र में ही पद्म ने बेटों को चैम्पियन बनाने का सपना देख लिया था। इसीलिए उन्होंने 17 साल की उम्र में ही 19 साल की गोमा के साथ भागकर शादी कर ली। दोनों करीब दो साल तक अंडरग्राउंड रहे क्योंकि परिवारवाले शादी के खिलाफ थे। दोनों ईटानगर में रहे। पहली संतान होने पर फैमिली का प्रेशर कम हुआ। शिव के 6 बच्चों में पहली चार बेटियां हुईं। उनका सपना अब भी अधूरा था। इसके बाद गोविंद का जन्म हुआ और आखिरी संतान के रूप में शिव पैदा हुए। बेटे 4 साल के थे कि पद्म ने उन्हें कराते की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी थी। कुछ साल बाद पद्म को एक और झटका तब लगा, जब उन्हें पता चला कि ये खेल (कराते) ओलिंपिक में है ही नहीं। पद्म ने हिम्मत नहीं हारी और खेल बदलते हुए बेटों को बॉक्सर बनाने की ठानी।

मेडल है अब टारगेट
लंदन ओलिंपिक में पहले राउंड में शिव बाहर हो गए थे। पिता का बेटे को ओलिंपिक में भेजने का सपना तो पूरा हो गया था, लेकिन उन्हें चैम्पियन बनाना अभी बाकी है। रियो ओलिंपिक में फैन्स से ज्यादा पद्म थापा की आंखों को उस पल का इंतजार है, जब शिव के गले में मेडल होगा।

ऐसी थी रुटीन
बेटों को बॉक्सर बनाने के लिए पद्म ईटानगर से गुवाहाटी शिफ्ट हो गए। बेटों ने ट्रेनिंग शुरू कर दी। रूटीन इतना टाइट था कि हर काम के लिए टाइम फिक्स था। सुबह 3 बजे उठकर दोनों भाई (गोविंद और शिव) होमवर्क करते थे। उसके बाद बॉक्सिंग ट्रेनिंग। स्कूल सुबह 8 बजे से शुरू होता था। प्रिंसिपल ने दोनों भाइयों को स्कूल प्रेयर में आने से छूट दे दी थी। ये वक्त भी दोनों भाइयों के लिए काफी अहम था। इतने में वो कड़ी ट्रेनिंग के बाद नाश्ता कर सकते थे। नाश्ते में उन्हें अंकुरित अनाज, बादाम, किशमिश, वेजिटेबल सूप और 5 उबले अंडे दिए जाते थे। लंच घर में होता था, जिसमें चिकन या पाया सूप और दाल-रोटी होती थी। डिनर टाइम में सबसे ज्यादा प्रोटीन होता है। ये पूरा शेड्यूल पद्म थापा ने तय किया था।

शरीर को ऐसे बनाया मजबूत
स्कूल से आने के बाद गोविंद और थापा दोपहर के ट्रेनिंग सेशन के लिए बॉक्सिंग क्लब जाते थे। शाम 7 बजे मैथ्स का ट्यूशन लेते थे। दिनभर में सिर्फ आधा घंटा टीवी देखने की छूट थी। रात को 10 बजे से पहले तो सोना होता ही नहीं था। पद्म के अनुसार, ‘वीकेंड में कुछ भी हॉलिडे जैसा नहीं होता था। बल्कि और कड़ी ट्रेनिंग होती थी। 11 साल का गोविंद और 9 साल के शिव क्रॉस कंट्री ट्रेनिंग के तहत 35 किमी की दौड़ लगाते थे। पद्म दोनों बेटों की लहसुन के तेल से मालिश करते थे, ताकि उनपर थकान हावी न हो। कई सालों तक दोनों भाई पिता के साथ कड़ी ट्रेनिंग लेते रहे। ये सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, बल्कि पद्म का सपना था, जिस राह पर उनके बेटे चल पड़े थे। अपने-अपने ऐज ग्रुप में दोनों भाई कई मेडल जीत चुके थे।

जब लाइफ में आया टर्निंग प्वाइंट
गोविंद और शिव को इतनी कम उम्र में पता भी नहीं था कि वो इतनी कड़ी ट्रेनिंग क्यों कर रहे हैं। वो तो बस पिता के बताए रास्ते पर चलते जा रहे थे। साल 2005 में नोएडा में हुई 21वीं सब जूनियर नेशनल चैम्पियनशिप शिव के करियर के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। इस टूर्नामेंट में उन्हें 36 KG वेट कैटेगरी में लड़ना था, लेकिन उन्हें किसी ने बताया कि इस टूर्नामेंट में ये वैट कैटेगरी ही नहीं है। तब उनके पिता ने शिव से दो लीटर पानी पीने के लिए कहा ताकि वे 38 KG वेट कैटेगरी में लड़ सकें। इस फाइट में शिव दूसरे बॉक्सर से काफी छोटे थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जीत गए। वो निडर होकर जंगल के राजा की तरह लड़े। मुश्किल में होने के बाद भी उसकी आंखों या चेहरे पर डर के भाव नहीं थे। उस चैम्पियनशिप को जीतने के साथ ही पद्म समझ गए थे कि उनके बेटे ओलिंपिक में जरूर जाएंगे। हालांकि, इस फाइट में जो बॉक्सर उसके सामने था वो काफी स्ट्रॉन्ग था। लेकिन इसके बाद भी शिवा ने इसे एक चैलेंज की तरह लिया। शिव की इस परफॉर्मेंस के बाद ऑफिशियल्स काफी इंप्रेस हो गए, जिसके बाद उसे सम्मानित भी किया गया।

याद है अप्रैल, 2012 का वो दिन
इस साल 18 साल के शिव थापा ओलिंपिक क्वालिफाई करने वाले भारत के सबसे युवा बॉक्सर बने। उन्होंने कजाखस्तान में एशियन क्वालिफायर्स में 56 kg वेट कैटेगरी में जगह बनाई थी। इस सक्सेस के बाद शिवा रातों रात सुपरस्टार बन गए। अगले कई दिनों तक उनके घर मीडिया का जमावड़ा लगा रहा। शिवा के पिता के मुताबिक इस दौरान उनके घर इतनी भीड़ थी कि 5 दिन तक उन्हें खाना बनाने और खाने का टाइम ही नहीं मिला। शिव के बड़े भाई इस मुकाम तक तो नहीं पहुंच सके, लेकिन वो असम के स्टेट लेवल चैम्पियन बॉक्सर हैं।

घर पर होते हैं अलग
स्टार बॉक्सर बनने के बाद शिव जब भी घर लौटते हैं, फैमिली के साथ ही पूरा टाइम बिताना पसंद करते हैं। शिव की बहन गंगा के अनुसार, ‘वो जब भी घर आते हैं तो अपना फोन बंद कर देते हैं।’ शिव की फैमिली आज भी उसी घर में रहती है, जहां से उनके पिता ने अपना करियर शुरू किया था।

- भास्कर
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