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HISTORY : 5वीं गोरखा राइफल्स के मेजर जनरल ने जब 'जख़्मी टांग को ख़ुद ही खुखरी से काट डाला'

  
बीबीसी  स्टोरी
गोरखा सैनिक उन्हें कारतूस साब बोलते थे. इनका नाम है इयान कारदोज़ो और ये पांचवीं गोरखा राइफल्स के मेजर जनरल थे. इन्होंने 1965 और 71 के युद्ध में हिस्सा लिया और इनके पास युद्ध से संबंधित ढेर सारे अनुभवों का ज़ख़ीरा है. भारत की ओर 1971 की भारत-पाक जंग में अपना पैर खुद काटने वाले मेजर जनरल इयान कारदोज़ो ने बीबीसी के ख़ास बातचीत में अपने अनुभव बताए:

पैर ख़ुद काटना पड़ा-
1971 के युद्ध की बात है. उस समय के पूर्वी पाकिस्तान में हेली की लड़ाई थी. हम लोग पाकिस्तानी सीमा के अंदर थे. मेरा पैर लैंडमाइन पर पड़ा और धमाका हो गया.  वहाँ के एक निवासी ने मुझे देखा और वो मुझे उठा कर पाकिस्तानियों के बटालियन मुख्यालय में ले गया. वहां मैंने डॉक्टर से कहा कि मुझे मॉरफीन दे दीजिए, लेकिन उनके पास मॉरफीन भी नहीं था. मैं गोरखा राइफल्स में था तो मेरे पास खुखरी थी. मैंने अपने साथ मौजूद एक गोरखा से कहा कि पैर काट दो. उस गोरखा ने कहा- 'मुझसे नहीं होगा.' तो मैंने खुद ही अपनी वो टांग काट दी. टांग काटने के बाद एक पाकिस्तानी डॉक्टर ने ऑपरेशन किया तो मैंने कहा था कि चाहे जो हो जाए मैं पाकिस्तानी का खून नहीं लूंगा. अब भी मेरे नाम बांग्लादेश में एक फुट बाय एक फुट की ज़मीन है जहां वो टांग दबाई गई है. आगे चलकर मैं पहला ऐसा अधिकारी बना जिसकी टांग नहीं थी और उसने ब्रिगेड का नेतृत्व किया हो.

गोरखा सैनिकों ने कंधे पर उठाया-
 
सिलहट की लड़ाई थी और मैं देर से पहुंचा था लड़ाई में. मैं आखिरी हेलीकॉप्टर में किसी तरह पहुंचा था. मेरी बटालियन के सैनिक मुझे खोज रहे थे. मैं जैसे ही पहुंचा तो गोरखा सैनिकों ने मुझे गोद में उठा लिया. ये गोरखा सैनिक मेरे साथ 65 के युद्ध में लड़े थे और वो मुझे खोज रहे थे कि कारतूस साब कहां है. वो गाने लगे- 'कारतूस साब होयकि हैना ...कारतूस साब होयकि हैना.' मैंने जीवन में बहुत कुछ देखा है. बहुत अवार्ड जीते हैं. सेना मेडल मिला है लेकिन ये क्षण मेरे जीवन का सबसे अच्छा क्षण था. दुनिया के बहादुर माने जाने वाले गोरखा सैनिकों ने जो सम्मान दिया वो सबसे सुखद है मेरे लिए.

जब बीबीसी ने जान बचाई
जंग के दौरान हम लोग बीबीसी सुनते थे और उस पर यकीन भी करते थे. 71 युद्ध के दौरान हमने बीबीसी रिपोर्टरों को सेना के साथ आने की अनुमति दी थी. एक ब्रॉडकास्ट हुआ जिसमें बताया गया कि इस ओर भारत की पूरी ब्रिगेड है जबकि हम लोग बस 600 सैनिक थे. हम 600 सैनिकों ने अपने सामने पाकिस्तान के एक हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण कराया. पाकिस्तान ने भी बीबीसी ब्रॉडकास्ट सुना था कि गोरखा सैनिकों की एक ब्रिगेड उतरी है यानी करीब चार हज़ार सैनिक... पाकिस्तान के सैनिकों ने जब आत्मसमर्पण किया तो उन्हें पता ही नहीं था कि हम बस 600 हैं. उन्होंने ब्रिगेड कमांडर को बुलाने की मांग की तो हमने कमांडर को दूसरे दिन बुलाया. सोचिए अगर पाकिस्तान को पता होता कि पूरी ब्रिगेड नहीं बस 600 सैनिक हैं तो यकीनन हम नहीं बचते.
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