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हिमाचल के नाहन में भुला दिया गया है ऐतिहासिक 'गोरखा वार मेमोरियल'


हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में नाहन के पक्का तालाब के समीप मुख्य सड़क के पास एक ऐतिहासिक  वार मेमोरियल है। शायद बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं। यह स्थल अक्सर झाडि़यों से ढका हुआ रहता है। भारत की दुसरी सबसे पुरानी नाहन नगर परिषद ने इस मेमोरियल की कभी साफ सफाई करने की सोची ही नहीं। सच भी है। डर भी है। कहीं नाहन यदि अपने प्राचीन और गौरवशाली इतिहास को लापरवाही के चलते हमेशा के लिए खो ना दे । यह एक गोरखा वार मेमोरियल है। एंगलो गोरखा वार के दौरान गोर्खा सैनिक जैतक फोर्ट से नाहन पर काबिज थे। कम लोग जानते हैं। कुछ समय के लिए सिरमौर का शासन गोरखा कमांडर काजी रणजोर थापा के हाथ रहा। यदि इतिहास को खंगालें तो हमें इस बात की जानकारी प्राप्त होगी कि एंगलो-गोरखा वार की शुरूआत और इसका अंत सिरमौर में ही हुआ था। सिरमौर नरेश को जब सत्ता से बेदखल कर दिया तो उन्होंने गोरखों से सहायता मांगी थी। गोरखों ने उनकी सहायता की किन्तु उन्हें गददी पर नहीं बैठा पाए। इस लिए नाहन में कुछ समय तक गोरखा शासन कायम हुआ था। गोरखा कमांडर रणजोर सिंह थापा ने यहां पर ब्रिटिश सेना को मात दी थी।

एंगलो गोरखा वार 26 दिसम्बर 1814 से 15 दिसम्बर 1816 तक चला। इस युद्ध में गोरखा सैनिकों ने ब्रिटिश और सिरमौर रियासत के सैनिकों की संयुक्त सेना को हराया था। इस युद्ध में करीब 600 सैनिकों के मारे जाने की सूचना है। सिरमौर नरेश कर्म प्रकाश ने देहरादून में जाकर गोरखा कमांडर काजी रणजोर थापा से भेंट कर अपने भाई रतन प्रकाश के विरूद्ध कार्रवाई के लिए कहा था। गोरखा सैनिकों ने कर्म प्रकाश के भाई पर कार्रवाही की और उसे सत्ता से बेदखल किया, किन्तु सिरमौर के वास्तविक नरेश को पुनः गददी पर नही बिठाया। इस प्रकार कर्म प्रकाश को सुबाथु में शरण लेनी पड़ी और बाद में 1826 में उनकी में मौत हो गई।

कर्म प्रकाश की पत्नी और गुलेर की रानी ने ब्रिटिश जनरल आॅक्टरलोनी से सिरमौर का राज वापिस दिलवाने की मांग की। इस अपील के बाद ब्रिटिशर ने गोरखों के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर कर दी। लुधियाना से निकलकर ब्रिटिश सैनिकों ने देहरादून से गोरखा सैनिकों को खदेड़ा और उसके पश्चात वे नाहन पहुंचे और नाहन से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित जैतक किले में गोरखों के विरूद्ध आक्रमण कर दिया। किन्तु इस युद्ध में ब्रिटिश सैनिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उनके सैनिक मारे गए और जान-मान का भारी नुकसान हुआ। गोरखा सैनिकों ने जैतक के किले पर तब तक कब्जा जमाए रखा जब तक 1815 में नेपाल सरकार और ब्रिटिश इंडिया गर्वमेंट के बीच सझौता नहीं हो गया। गोरखा वार के उपरांत भी ब्रिटिश इंडिया गर्वमेंट ने सिरमौर की महारानी से किया गया अपना वायादा नहीं निभाया। ब्रिटिशर ने भी गोरखों से सिरमौर को आजाद करने के बाद भी सिरमौर नरेश कर्म प्रकाश को पुनः गददी पर नहीं बिठाया। सिरमौर नरेश की पत्नी को नाबालिग राजकुमार फतह प्रकाश का वारिश बनाया गया और उन्हें सनद आरम्भ की।


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