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नेपाल भूकंप का 1 साल: सहम कर कहती रही पड़ोसियों से, चलो एकसाथ मर जाते हैं


उपमिता वाजपेयी 
काठमांडू : पिछले साल 25 अप्रैल को आए भूकंप से नेपाल के तीन गांव बारपक, मांदरे और लाप्राक तबाह हो गए थे। भूकंप का केंद्र बारपक ही था। सबसे ज्यादा तबाही भी यहीं हुई। नेपाल के सबसे बड़े हादसे के एक साल बाद इन तीन गांवों की स्थिति जानने भास्कर पहुंचा नेपाल। नेपाल की उस जगह का हाल, जहां मिट्टी के घर देखने आते थे टूरिस्ट...


#1) बारपक :
जिन मिट्टी के घरों को देखने टूरिस्ट आते थे, वह नहीं रहे

- स्टोन स्लेट की जो संकरी सड़क गोरखा को बारपक से जोड़ती थी वो अब सिर्फ यहां-वहां फैले पत्थरों और उखड़ी चट्‌टानों का पगडंडीनुमा रास्ता रह गया है।
- काठमांडू से 145 किमी दूर है गोरखा। जिसे हम रास्ता कह भर सकते हैं, वहां से दिन में चार बसें गुजरती हैं। एक बारपक से काठमांडू। दूसरी बारपक से गोरखा।
- इसी रूट की दो बसें लौटती हैं। अलावा इसके कुछ ट्रैक्टर सीमेंट और अन्य सामान लेकर गुजरते हैं। एनजीओ और सरकार की 4 बाय 4 व्हील वाली बुछ गाड़िया भी गुजरती हैं।
- एेसी ही एक गाड़ी में लिफ्ट मिल गई। लोकल एफएम गोरखाली रेडियो पर नेपाली गाने बज रहे थे। साथ बैठे लोगों में दो ऐसेे थे, जिन्होंने भूकंप में अपने घरों को मलबा बनते देखा था। अपनों को खोया था।
- गोरखा से बारपक के लिए चलना शुरू किया तो पहले चार किमी गाड़ी पहाड़ी नदी के साथ-साथ आगे चली।
- पहिए से बड़े पत्थरों के बीच खड़ी चढ़ाई थी। पहाड़ों की ऊंचाई से दोगुनी गहरी खाई के बीच से गाड़ी आगे बढ़ रही थी और चार घंटे में 60 किमी पहुंचाने वाले रास्ते पर धूल का गुबार ऐसा कि आगे के पहिए गुजरने के बाद शायद अपनी गाड़ी भी नजर न आए।

यहां भूकंप ने छीन लिया बचपन

- बारपक बस स्टैंड पहुंचने पर मिट्‌टी में सने बच्चे मुस्कुराते हुए स्वागत करते मिले। बोले- नमस्ते।
- अनजान लोग अब इन्हें जरा भी असहज नहीं करते। बीते एक साल ने इन्हें कई साल बड़ा कर दिया है।
- भूकंप ने सिर्फ घर नहीं छीने, बचपन भी छीन लिया है। बारपक उस दिन से ही दुनिया के नक्शे पर आ गया था जब पिछले साल 25 अप्रैल को आए भूकंप का एपिसेंटर बना था।
- बारपक में 1380 घर होते थे। भूकंप आया तो बमुश्किल 30-40 कॉन्क्रीट से बने घर खड़े रह पाए। नेपाल के सबसे घनी आबादी वाले बारपक में टूरिस्ट मिट्‌टी और पत्थर के बने पारंपरिक घर देखने ही आते थे।
- पहले कोई कॉन्क्रीट का घर बनाता था तो यहां के बुजुर्ग नाराज होते थे। भूकंप में सिर्फ सीमेंट के बने घर बचे रहे तो बुजुर्ग भी अब वैसे ही घर बनाने की हिदायत दे रहे हैं। "बारपक इन' नाम की होटल चलाने वाले रामबहादुर गुरुंग को भी अपनी कॉन्क्रीट होटल पर भरोसा है। कहते हैं ये 7.8 भूचाल देख चुका है, आप यही बैठो यहां सेफ रहोगे।

भूकंप ऐसा कि गर्भ के बच्चे को भी लग गई चोट

- गांव की संतामाया तब 8 महीने प्रेगनेंट थीं। घर के मलबे में चार घंटे तक उनका पैर धंसा रहा। असर कोख में मौजूद उजल पसांग पर भी हुआ।
- जब उसका जन्म हुआ था तो उसके चेहरे पर चोट के निशान थे। उस वक्त 22 साल की गम्या गुरुंग भी गर्भ से थी।
- भूकंप में पति की मौत हो गई तो ससुराल वालों ने इसका इल्जाम गम्या पर मढ़ दिया। उसे घर से निकाल दिया।
- अब वो 11 महीने के बेटे के साथ किराए का कमरा लेकर रहती है। बेटे और पति की मौत का सदमा फूलदानी घानी सह न सकी।
- वो ये सोचते हुए मानसिक रोगी हो गई कि उनके पास अब कुछ नहीं बचा। कांची गुरुंग तो कई दिनों तक अपने पड़ोसियों को कहती रही कि चलो सभी साथ चलकर मर जाते हैं।

सालभर नहीं मनाई गई खुशियां

- एक साल में इन गांवों में शादियां तो हुई हैं, लेकिन कहीं बाजा नहीं बजा। न ही खुशियां मनाई गई। किसी ने नए कपड़े नहीं बनवाए।
- जो गहने पहले से बनवा रखे थे उन्हें दोबारा गृहस्थी जुटाने के लिए बेच दिया। भूकंप आया तो सुखराम गुरुंग दौड़कर घर से बाहर निकले, लेकिन पड़ोसी के घर के मलबे की चपेट में आ गए।
- जख्मी हालत में उन्हें एयरलिफ्ट कर पोखरा ले जाया गया। उनका एक हाथ काटना पड़ा। इलाज करवाकर लौटे तो अपने उस घर में कभी नहीं गए।
- बसस्टैंड के पास एक छोटी-सी दुकान खोल ली है। कहते हैं दो हाथ से काम जल्दी कर लेता था। अब दूसरों की मदद लेनी पड़ती है।
- भारतीय सेना से रिटायर हुए 85 साल के सूबेदार जयराम गुरुंग मेडिकल कोर में थे। अब गांववालों के लिए छोटा-सा दवाखाना चलाते हैं।
- कहते हैं पाकिस्तान के साथ युद्ध लड़ा है मैंने। लेकिन पिछले एक साल में इतना डरा हूं कि बमुश्किल रात को नींद आती है।
- उनका घर सुरक्षित रहा, कांक्रीट का जो बना था। लेकिन वो पूरे एक महीने खेत में टेंट लगाकर सोए थे।

#2. मांदरे : अपने टूटे घरों में अब वो रह नहीं सकते, उनका गांव डेंजर जोन है
- भूकंप के बाद मांदरे गांव के 65 घरों में रहनेवाले लोगों को गांव खाली करना पड़ा। भूकंप उनकी जमीन तक निगल गया, क्योंकि अब इस इलाके को डेंजर जोन घोषित कर दिया गया है।
- भूकंप में लाेगों के घर ढह गए और जहां नए घर जुगाड़े वहां जमींदार को 1500 रुपए महीना किराया देना पड़ता है।
- जो किराया नहीं दे पा रहे हैं वो अपने पुराने खंडहर हो चुके घरों में लौट आए हैं। उन पुराने घरों के आसपास जमीन में गहरी खाई हो गई है।
- बारिश में लैंडस्लाइड का खतरा हमेशा बना रहता है। भूकंप में मारे गए गांव के 18 लोगों की कब्र घर के मलबों के पास ही बनी है।
- बच्चों की तालीम के लिए गांव में जो एक स्कूल था, वो बंद हो चुका है। भूकंप इन बच्चों को अलग ही सबक दे गया है।
- बच्चे अब दूर स्कूल जाने के बजाए ढह चुके अपने घरों को दोबारा बनाने में हाथ बंटा रहे हैं।

#3. लाप्राक : एक भी घर नहीं बचा, अब बर्फ के बीच वे टेंट में गुजारा कर रहे हैं
- तिरपाल और टीन से अब लाप्राक गांव के लोग भी नए घर बना रहे हैं। 1700 मीटर की ऊंचाई पर बसे लाप्राक में 624 घर थे।
- भूकंप में एक भी नहीं बचा। पूरा गांव तबाह हो गया। मजबूरन पूरा गांव 2800 मीटर की ऊंचाई पर शिफ्ट कर दिया गया।
- जहां वो पहले थे वहां बर्फबारी नहीं होती थी। लेकिन बीती सर्दियों में उन्होंने पहली बार बर्फबारी झेली।
- वो भी तिरपाल और टीन के बने अस्थाई घरों और टेंट में गुजर-बसर करते हुए। काफी मुश्किल दिन बीत रहे हैं।
- जिस दिन भूकंप आया तब सेना का हेलिकॉप्टर भी यहां तक नहीं पहुंच सका था। दो बार कोशिश भी की गई, लेकिन खराब मौसम और बारिश ने इजाजत नहीं दी।
- चार दिन तक कोई संपर्क नहीं था। ध्वस्त हो चुका गांव दुनिया से पूरी तरह कट गया था।
- बाकी दुनिया को पता तक नहीं चला कि कितना नुकसान हुआ है, लोग किस स्थिति में हैं। रास्ता ऐसा था कि वहां गाड़ी का आना भी नामुमकिन था।
- सेना चार दिन की चढ़ाई के बाद यहां पहुंची थी। उसके बाद राहत के काम शुरू हो सके।


- भास्कर 
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