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अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन पर मुहर, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दी मंजूरी

नई दिल्ली : अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने केंद्र की सिफारिश को स्वीकार कर लिया है। सोमवार को गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाक़ात कर उन्हें राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की सिफारिश के कारण बताए थे। वहीं, कांग्रेस ने केंद्र की सिफारिश खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी है। राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ ही राष्ट्रपति शासन की औपचारिकताएं शुरू हो गई हैं। सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रपति ने कानूनी विशेषज्ञों से सलाह मशविरे और सभी पक्षों के दावों पर गंभीरता से विचार करने के बाद यह फैसला लिया है। अरुणाचल के पूर्व सीएम नबाम तुकी का कहना है कि अब यह मामल सुप्रीम कोर्ट में है। हम मामले में कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। तुकी का दावा है कि कांग्रेस को विधानसभा में बहुमत प्राप्त है। अब महारे 16 सदस्य नहीं हैं। कोर्ट इस मामले में निर्णय लेगी।

वहीं, बागी नेता कलिखो पुल का कहना है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन के लिए तुकी जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि बीजेपी इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। पुल का कहना है कि अक्टूबर में ही राष्ट्रपति शासन  लगा दिया जाना चाहिए था। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से मुलाक़ात कर उनसे अनुरोध किया था कि वह अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की केंद्र सरकार की सिफारिश को मंज़ूर न करें। राष्ट्रपति के फैसले से कांग्रेस पार्टी का अब वो दावा कमजोर हुआ है जिसमें यह  कहा गया था कि अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन लगाने की कैबिनेट की सिफारिश असंवैधानिक है। अब राष्ट्रपति के फैसले के बाद कांग्रेस को कानूनी लड़ाई का सहारा लेना पड़ेगा। ये महत्वपूर्ण है कि कल ही कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कैबिनेट के फैसले को चुनौती दी थी।

गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक़ राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करते हुए सरकार ने कहा

- अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा सत्र 21 जुलाई को समाप्त हुआ और छह महीनों के भीतर यानी 21 जनवरी तक दोबारा सत्र नहीं हुआ।
- जबकि छह महीनों के भीतर सत्र बुलाना संवैधानिक बाध्यता है और ऐसा न होने से संवैधानिक संकट पैदा हो गया है।
- अगर सुप्रीम कोर्ट 16 दिसंबर के सत्र को मान्यता देती है तो भी इसका मतलब है कांग्रेस सरकार  अल्पमत में आ गई है।
- राज्य सरकार राज्यपाल के पत्रों का जवाब नहीं दे रही थी।
- राजभवन के घेराव पर राज्य सरकार चुप रही
- राज्य में क़ानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई है।

आइए समझें पूरा घटनाक्रम
अरुणाचल प्रदेश में 18 जनवरी को अनोखे राजनीतिक घटनाक्रम में गुरुवार को बागी कांग्रेस विधायकों ने भाजपा के सदस्यों के साथ मिलकर एक स्थानीय होटल में बैठक करके मुख्यमंत्री नबाम तुकी को पद से हटाने और एक बागी कांग्रेस विधायक को उनकी जगह चुनने का फैसला किया, लेकिन गोवाहाटी उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुए बागियों की बैठक में लिए गए सभी फैसलों को स्थगित कर दिया। कोर्ट ने अंतरिम आदेश के रूप में 2 फरवरी तक विधानसभा की कार्यवाही पर रोक लगा दी है।

विधानसभा अध्यक्ष की याचिका पर आदेश
राज्यपाल जेपी राजखोवा से नाराजगी जताते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य ‘विधानसभा’ द्वारा लिए गए सभी फैसलों पर रोक लगा दी जिसमें विधानसभा अध्यक्ष नाबम रेबिया को हटाने का निर्णय भी शामिल है। राज्यपाल द्वारा 14 जनवरी, 2016 से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र को पहले आयोजित करके 16 दिसंबर से बुलाने के लिए जारी 9 दिसंबर की अधिसूचना को चुनौती देते हुए विधानसभा अध्यक्ष द्वारा दाखिल रिट याचिका पर अदालत ने यह आदेश दिया।

नबाम रेबिया पर होटल में चला महाभियोग
नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम तब हुआ था जब बागी विधायकों ने एक सामुदायिक केंद्र पर अस्थाई ‘विधानसभा’ में अध्यक्ष नबाम रेबिया पर ‘महाभियोग’ चलाया। कांग्रेस के बागी 20 विधायकों के साथ यहां एक होटल के कांफ्रेंस हॉल में हुई बैठक में भाजपा के 11 और दो निर्दलीय विधायकों ने भी भाग लिया। विधानसभा परिसर बुधवार से सील है।


कांग्रेस विधायक कलिखो पुल को मुख्यमंत्री चुन लिया
भाजपा विधायकों और निर्दलीय विधायकों द्वारा रखे गए ‘अविश्वास’ प्रस्ताव को जब पारित किया गया तब आसन पर उपाध्यक्ष टी नोरबू थांगदोक बैठे थे जो खुद बागी कांग्रेसी हैं। बाद में 60 सदस्यीय सदन के 20 बागी कांग्रेस विधायकों समेत कुल 33 सदस्यों ने एक और असंतुष्ट कांग्रेस विधायक कलिखो पुल को राज्य का नया ‘मुख्यमंत्री चुन लिया।’
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