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जानिए धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के रूप में जन्में नेपाल के संविधान में क्या है बातें


काठमांडू : कई सालों की जनआकांक्षाओं, तनावों और यहां तक कि ख़ून-ख़राबे पर विराम लगाते हुए नेपाल की संविधान सभा ने देश के पहले ऐतिहासिक संविधान को जन्म दिया है। यह पहला संविधान है जिसे संविधान सभा ने बनाया है। हालांकि कुछ स्थानीय पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं. उनका तर्क है कि दक्षिणी नेपाल के मधेसी और थारू जैसे अल्पसंख्यक समूहों की चिंताओं का निवारण नहीं किया गया है। रविवार को एक कार्यक्रम में देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राम बरन यादव नेपाल के इस ऐतिहासिक संविधान को अधिकारिक तौर पर राष्ट्र को समर्पति करेंगे। इस संविधान ने दुनिया के एकमात्र हिंदू राष्ट्र नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र में बदल दिया है। सात प्रांतों के इस राष्ट्र में अब बहुमत पर आधारित 'सुधरा हुआ बहुदलीय प्रजातंत्र' होगा।

इतिहास होगी राजशाही
देश की राजशाही अब इतिहास होगी और राष्ट्रपति देश के संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष होंगे जबकि कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास होंगी। यही नहीं नेपाल एक अनूठा धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र होगा जिसमें सभी धर्मों को स्वतंत्रता तो होगी, लेकिन राष्ट्र का कर्तव्य सनातन धर्म और उसकी संस्कृति को बचाना होगा। नेपाली हिंदुओं की पूजनीय गाय राष्ट्रीय पशु होगी। पूर्व की राजशाही नेपाल में अब सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा. केंद्र में संघीय सरकार होगी जबकि प्रांतों में प्रांतीय सरकार होगी. ज़िला और ग्राम स्तर पर भी शासन व्यवस्था होगी।

राज्य के नाम और सीमाएं तय नहीं
प्रस्तावित सात राज्यों के नाम और सीमाएं अभी तय नहीं किए गए हैं. यह एक बेहद जटिल और विवादित मुद्दा है। देश के दक्षिणी तराई इलाक़े और पश्चिमी इलाक़ों में इन प्रस्तावों को लेकर हिंसक प्रदर्शन भी हुए हैं जिनमें अब तक कम से कम 40 लोग मारे गए हैं। आरक्षण और कोटा व्यवस्था के ज़रिए वंचित, क्षेत्रीय और जातीय समुदायों के सशक्तिकरण की व्यवस्था भी संविधान में की गई है। मूल निवासियों, दलितों, अछूतों और महिलाओं के लिए स्थानीय प्रशासन, प्रांतीय और संघीय सरकार से लेकर हर स्तर पर आरक्षण का प्रावधान किया गया है। संविधान में तीसरे लिंग यानी थर्ड जेंडर को भी मान्यता दी गई है।

सभी भाषाओं को मान्यता
नए संविधान की एक और रोचक बात यह है कि इसमें सभी जातीय भाषाओं को मान्यता दी गई है और प्रांतीय सभाओं को अपनी आधिकारिक भाषा चुनने का अधिकार होगा। लेकिन नेपाली देश की राष्ट्रीय भाषा बनी रहेगी। तमाम ख़ासियतों के बावजूद भी नया संविधान सभी लोगों का दिल नहीं जीत सका है. कई जातीय समूह और महिला अधिकार कार्यकर्ता अधिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं। जनसंख्या के आधार पर जातीय समूहों के हर स्तर पर प्रतिनिधित्व की मांग की जा रही है। बच्चों की नागरिकता सुनिश्चित करने के लिए महिलाओं को बिना शर्त अधिकार देने की भी मांग की जा रही है। अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। 37 अध्यायों वाले संविधान के तहत दो सदनों वाली संसद, एक सदन वाली विधानसभा और तीन ज़िला, प्रांतीय और संघीय स्तर पर तीन स्तरीय न्याय पालिका होगी। प्रांतों के गठन को संविधान की उपलब्धि बताया जा रहा है लेकिन संघीय ढांचे में प्रांत कैसे बनाए जाएंगे इसे लेकर अभी फ़ैसला नहीं लिया गया है।

हिंसा का डर
संविधान में प्रस्तावित सात प्रांतों के नाम और सीमाएं तय करने के लिए आयोग के गठन का प्रावधान है। नेपाल के बहु-जातीय और भौगोलिक विविधता को देखते हुए यह एक बेहद मुश्किल और जटिल काम होगा. नेपाल में 100 से ज़्यादा जातीय समूह और कई भाषाएं हैं। कई जातीय समूह हमेशा से हाशिए पर रहे हैं और मुख्यधारा से बाहर रहे हैं. इन समूहों को लग रहा है कि प्रस्तावित संघीय ढांचे में उनकी चिंताओं का निवारण नहीं किया गया है।  विशेषज्ञों के मुताबिक़ सबसे बड़ा डर यह है कि यदि सभी मुख्य जातीय और क्षेत्रीय समूह जातीय आधार पर दक्षिणी नेपाल के मधेसी और थारू लोगों की तरह अपने लिए अलग प्रांत की मांग करने लगे तो हालात बेहद मुश्किल और बेक़ाबू हो सकते हैं। नेपाल के नस्लीय हिंसा के चक्र में फँसने का ख़तरा भी है। अब भी, दक्षिणी नेपाल के मधेसी दलों का एक समूह, जो संविधान सभा में भी शामिल नहीं हुआ है, ख़ुश नहीं है और रविवार को होने वाले समारोह के विरोध का आह्वान किया है। जबकि मुख्य राजनीतिक दल लोगों से संविधान के गठन पर जश्न मनाने का आग्रह कर रहे हैं। दक्षिणी नेपाल में रहने वाले भारतीय मूल के मधेसियों और थारू जैसे अन्य जातीय समहूों, मुस्लिम अल्पसंख्यकों और देसी लोगों के हितों और चिंताओं का ध्यान रखने के लिए संविधान में एक अलग आयोग गठित करने का प्रावधान भी है। नेपाल में अगले संसदीय चुनावों से पहले अंतरिम प्रावधान भी किए गए हैं। नए नियम के तहत संविधान के लागू होने के सात दिनों के भीतर नेपाली कांग्रेस के नेता सुशील कोइराला का स्थान लेने के लिए नए प्रधानमंत्री के चयन, 20 दिनों के भीतर नई संसद के अध्यक्ष के चुनाव और एक महीने के भीतर नए राष्ट्रपति के चुनाव का प्रावधान है।

भारत की चिंताएं
अमरीका, चीन, ब्रिटेन और भारत समेत नेपाल के सभी विदेशी दोस्तों ने संविधान के पूरा होने की प्रशंसा की है. हालांकि इन देशों ने दक्षिणी नेपाल में जारी विरोध प्रदर्शनों पर चिंता भी ज़ाहिर की है। हालांकि सभी देश चाहते हैं कि नेपाल नए संविधान में सभी असंतुष्ट दलों का ख़्याल रखे, लेकिन नेपाल का प्रभावशाली पड़ोसी भारत इससे कुछ ज़्यादा चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश सचिव एस जयशंकर को शुक्रवार को अपने विशेष दूत के रूप में काठमांडू भेजा। रिपोर्टों के मुताबिक़, उन्होंने दक्षिणी नेपाल में हिंसा को लेकर भारत की चिंताओं से नेपाल को अवगत करा दिया है। भारत चाहता है कि संविधान के निर्माण में यथासंभव आम सहमति हो। भारत नेपाल के साथ सिर्फ़ सीमा ही नहीं संस्कृति भी साझा करता है ऐसे में नेपाल में भारत का बहुत कुछ दांव पर है। यदि दक्षिणी नेपाल में हिंसा होगी तो उत्तर भारत पर भी इसका व्यापक असर होगा। लोग अपनी जान बचाने के लिए बड़ी तादाद में भारत आएंग।  भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल अशोक मेहता कहते हैं कि भारत की चिंताएं जायज़ हैं। आख़िरकार नेपाल एक अहम दौर से गुज़र रहा है और इतिहास रच रहा है। दक्षिणी नेपाल जहां विरोध प्रदर्शनों में कई लोगों की जान गई है, वहां भले ही जश्न का माहौल न हो लेकिन नेपाल के अधिकतर इलाक़ों में रविवार को होने वाले समारोह को लेकर जश्न जैसा माहौल है। नए संविधान, बहुदलीय लोकतंत्र और नए प्रांतों को संस्थागत करने में अभी और वक़्त लगेगा।

- बीबीसी रिपोर्ट

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