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नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री भट्टराई के कदम से नेपाल में बन सकती है भारत की बात

नई दिल्ली। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई के माओवादी पार्टी से इस्तीफे से इस देश के संविधान में मधेसी और बाकी अल्पसंख्यक समुदायों के बारे में भारत के सुझावों को और बल मिल सकता है । नेपाल में बने हालिया संविधान में मधेसी समुदाय को अधिकार नहीं दिए जाने के मामले में भट्टराई ने इस्तीफा दिया है। एक्सपर्ट्स ने बताया कि भट्टराई नेपाल कांग्रेस और युनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी के मधेसी नेताओं को भी प्रभावित कर सकते हैं, जिससे भारत को भी नेपाल के पहाड़ी और तराई इलाकों में राजनीतिक समीकरण को नए सिरे से तय करने में भूमिका निभाने का मौका मिल सकता है। भट्टराई ने शुरू में देश के नए संविधान का समर्थन किया था, लेकिन एक हफ्ते के भीतर उन्होंने यू-टर्न ले लिया। हालांकि, भट्टराई आम जनता के बीच प्रचंड जितने लोकप्रिय नहीं हैं। नेपाल में दीर्घकालिक स्थायित्व के लिए भारत लगातार सबको लेकर चलने वाले संविधान की वकालत करता रहा है।

नेपाल और भारत की सीमा खुली है और ऐसे में भारत वहां की स्थानीय सरकार के साथ मिलकर भारत-विरोधी ताकतों को अलग रखने को लेकर काम कर रहा है। एक अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं किए जाने की शर्त पर बताया कि यह भारत के हित में है कि नेपाल में लोकतंत्र फले-फूले, लिहाजा वहां का संविधान स्थायी होना चाहिए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि भट्टराई का विद्रोह नेपाल के नए संविधान के चरित्र को लेकर सत्ता के मठाधीशों के बीच मतभेद का पहला संकेत है। उनके मुताबिक, मधेसी समुदाय के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में इन प्रतिनिधियों ने किसी तरह का लचीलापन नहीं दिखाया। एक एक्सपर्ट ने बताया कि भट्टराई को नेपाल के गोरखाओं का भी समर्थन हासिल है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर भट्टराई मधेसी नेताओं और बाकी समान विचारधारा वाली ताकतों के साथ हाथ मिलाते हैं, तो तराई रीजन में पीड़ित पक्षों की तरफ से आंदोलन तेज हो सकता है।

काठमांडू के सूत्रों ने बताया कि भट्टराई ने अपने इस्तीफे के तुरंत बाद मधेस नेता और पूर्व मंत्री राजेंद्र महतो से संपर्क कर इस समुदाय के आंदोलन का हिस्सा बनने की इच्छा जताई। भट्टराई ने महतो को बताया कि संविधान के भेदभाव वाले प्रावधानों के खिलाफ लड़ रही ताकतों को मधेस में अपना आंदोलन तेज करना चाहिए। महतो के मुताबिक, युनाइटेड डेमोक्रेटिक मधेसी फ्रंट ने मेची से महाकली तक नाकेबंदी कर रखी है और यह तब तक जारी रहेगी, जब तक मांगे नहीं मान ली जाती हैं। मौजूदा आंदोलन के साथ समर्थन जाहिर करने के लिए भट्टराई बुधवार को जनकपुर का दौर करेंगे। एक और असंतुष्ट माओवादी नेता और भट्टराई के करीबी राम रीझन यादव का कहना था कि उन्हें मौजूदा आंदोलन का समर्थन करना चाहिए।

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