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मूवी रिव्यू: सादगी और मिठास से भरी यशराज बैनर की 'दम लगाके हईशा'

नई दिल्ली: ‘दम लगाके हईशा’ पिछले कई सालों में ये यशराज बैनर से निकलने वाली सबसे अच्छी फिल्म है. अगर आप 90 के दशक में बड़े हुए हैं और अगर उस दौर का माहौल और ख़ासतौर पर रिश्तों के प्रति लोगों का नज़रिया आपकी यादों में धुंधला गया है तो ये फिल्म आपको वापस उस दौर में ले जाएगी.वो दौर जब अरेंज्ड मैरिज सामान्य बात थी, तलाक से ज़्यादा रिश्तों को निभाने पर ज़ोर दिया जाता था, लोग वीएसएस टेप्स पर फिल्में देखते थे, ऑडियो कैसेट्स पर गीत-संगीत सुनते थे और गायक कुमार शानू नौजवानों के दिलों पर राज करते थे. हरिद्वार के मध्यवर्गीय परिवार का लड़का प्रेम (आयुष्मान खुराना) हाई स्कूल फेल है, कुमार शानू का फैन है और ऑडियो कैसेट की दुकान चलाता है. उसके अंदर किसी तरह का कोई टैलेंट नहीं है. परिवार उसकी शादी संध्या (भूमि पेडनेकर) से करवा देता है. 

भूमि पढ़ी-लिखी लड़की है लेकिन उसका वज़न ज़्यादा है जिसकी वजह से प्रेम बार-बार उसका अपमान करता है. तंग आकर संध्या अपने घर वापस लौट जाती है. फिर किस तरह दोनों में प्यार होता है फिल्म बड़े दिलचस्प अंदाज़ में यही कहानी कहती है. ये स्टोरी आयडिया आपको यशराज फिल्म्स की ही रब ने बना दी जोड़ी की याद दिलाएगा लेकिन यहां ज़्यादा ध्यान फिल्म की सेटिंग और किरदारों पर दिया गया है. फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट कमाल की है और इस फिल्म को दूसरे ही स्तर पर ले गई है. फिल्म के कई सीन जैसे जब परिवार वाले लड़के को शादी के लिए मनाते हैं तो कैसे तर्क देते हैं, प्रेम और संध्या के बीच के सीन और प्रेम और उसके पिता के बीच के सीन कमाल के हैं. ये शायद अकेली मेनसट्रीम फिल्म होगी जिसमें हीरो आरएसएस की शाख़ा में नियमित रूप से जाता है. शाखा वाले सीन्स को जिस तरह ह्यूमर के ज़रिए कहानी में पिरोया गया है, वो बेहद मज़ेदार है. हालांकि फिल्म का अंत बेहद घिसा-पिटा और फिल्मी है. आपको पहले से पता रहता है कि क्या होने वाला है मगर यहां तक पहुंचते पहुचते आप किरदारों की हरकतों और उनकी सादगी में मज़ा आने लगता है. अब बात कलाकारों की, प्रेम के रूप में आयुष्मान खुराना ने बढ़िया वापसी की है. उनकी हवाईज़ादा देखने के बाद दर्शकों ने उनसे उम्मीद ही छोड़ दी थी, ये फिल्म वापस उम्मीद जगाती है. 

हालांकि कई सीन में वो अपने पंजाबी लड़के वाले अंदाज़ में आ जाते हैं. लेकिन कई सीन उन्होंने बेहद अच्छे किए हैं. संध्या के रोल में भूमि पेडनेकर बॉलीवुड में इस साल की सबसे बड़ी खोज हैं. जिस तरह से वो अपनी घबराहट, परेशानी, अपमान और गुस्सा दिखाती हैं वो काबिले तारीफ़ है. एक ऐसा रोल निभाना आसान नहीं है जिसमें लुक्स और वज़न का मज़ाक उड़ाया जा रहा हो लेकिन भूमि इस खूबसूरती से निभा गई हैं कि दर्शक उनके किरदार का साथ हो जाते हैं. मगर फिल्म को अच्छा सिर्फ़ ये दोनों एक्टर ही नहीं बनाते पिता के रोल में संजय मिश्रा कमाल करते हैं, सीमा पाहवा, अल्का अमीन और शीबा चढ्ढा ने मिलकर हर सीन में जैसे जान फूंक दी है. फिल्म ख़त्म होती है तो लीड एक्टर्स के बजाय इनके सीन ज़्यादा याद रहते हैं. फिल्म की शुरुआत गायक कुमार शानू की आवाज़ से होती और आप 90 के दौर में चले जाते हैं. ये आवाज़ और कुमार शानू का ज़िक्र फिल्म के कई अहम सीन्स में सुनाई देता है. 

पूरी फिल्म में कुमार शानू जैसे एक किरदार की तरह मौजूद रहकर जो उस दौर के नौजवानों की चाहतों और सपनों को आवाज़ देते नज़र आते हैं. शायद 90 के दशक की कहानी के लिए ही उस दौर के मशहूर संगीतकार अनु मलिल का कमबैक कराया गया है और अनु ने सब्जेक्ट के हिसाब से बढ़िया संगीत दिया है. फिल्म के गीत वरण ग्रोवर ने लिखे हैं और ख़ास तौर पर एक गीत ये मोह मोह के धागे बहुत अच्छा है. बड़ी-बड़ी स्टारकास्ट के साथ धूम और ग़ुंडे जैसी बकवास फिल्में बनाने में महारत हासिल कर चुके यशराज बैनर के लिए निर्देशक शरद कटारिया अच्छी ख़बर हैं. जिस तरह से उन्होंने फिल्म का मिडिल क्लास सेटअप, सादगी और एक ख़ास दौर को पर्दे पर उतारा है उसकी तारीफ़ होनी चाहिए. हालांकि फिल्म की गति कहीं-कहीं धीमी पड़ती है और ख़ासतौर पर भूमि के किरदार पर और मेहनत की जा सकती थी. लेकिन शरद कटारिया ने दिल से ये फिल्म बनाई है और यही बात इस फिल्म को ख़ास बनाती है.

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