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..तो भारतीय सेना में नहीं बल्कि ब्रिटिश आर्मी में होते जीतू राई

इंचियोन। पिता की मौत के बाद उन्होंने यह तो तय कर लिया था कि वह सेना में शामिल होंगे। यह भी निर्णय ले लिया था कि यह सेना या तो भारत की होगी या फिर ब्रिटेन की। साल 2006 में वह मौका भी आया जब भारत और ब्रिटेन दोनों की सेनाओं में एक साथ भर्ती खुली। दुविधा में पड़े शूटर जीतू राई को अब यह फैसला करना था कि वह किस देेश की सेना की भर्ती में शामिल हों। यहां दिमाग नहीं दिल से आवाज निकली कि भारतीय सेना की भर्ती में पहले जाना है। आखिर जीतू के पिता गोरखा रेजीमेंट में जो रह चुके थे। फिर क्या था वह भारत आए और उन्होंने सेना का दामन थाम लिया। यहीं सेना में आकर उन्होंने शूटिंग शुरू की और अब वह इतिहास रच रहे हैं।

 भले ही जीतू मूल रूप से नेपाली हों लेकिन अब उनके दिल में यूपी और खासतौर पर लखनऊ बस चुका है। तभी तो जीतू कहते हैं कि अब जो पैसा मिलेगा उससे अपना पहला घर खरीदकर लखनऊ में ही बनाएंगे। उत्तर प्रदेश की सरकार ने भले ही जीतू के लिए कैश अवॉर्ड की घोषणा कर दी हो लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स के गोल्ड का पैसा अब तक उनके हिस्से में नहीं आया है। जीतू कहते भी हैं कि उन्हें अब तक यूपी सरकार से कुछ नहीं मिला है, लेकिन वह यह कभी मांग नहीं करेंगे कि उनके पदकों के बदले उन्हें कुछ दिया जाए। जीतू ने कहा कि अभी तक तो उनके पास अपना कोई मकान नहीं है, लेकिन वह अपना आशियाना लखनऊ में ही बसाएंगे।

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