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'गोरखा गोल्डन बॉय' जीतू राई का एशियाड के बाद पहला इंटरव्यू पढ़ें

अगर उपलब्धियों भरा यह साल न होता, तो निशानेबाज जीतू राई की पहचान गोरखा रेजिमेंट से होती। हालांकि, जीतू उतने भर से संतुष्ट रह जाते, क्योंकि उनके मुताबिक ‘अगर फौज में न होता, तो इटारी (नेपाल) में अपने खेतों में आलू उगा रहा होता या भैंस-बकरी चरा रहा होता।’ खेत भी इतने नहीं थे कि पूरे परिवार का गुजर-बसर हो जाए। पर इस साल ने उनकी पहचान के साथ सात पदक जोड़े, जिनमें से एक इंचियोन एशियाड में भारत को मिलने वाला पहला स्वर्ण पदक है। भारतीय मीडिया ने ही नहीं, बल्कि नेपाली मीडिया ने भी उन्हें ‘गुदड़ी के लाल’ से नवाजा है। एशियाड में उनके शानदार प्रदर्शन के बाद उनका पहला इंटरव्यू पढ़ें।

50 मीटर एयर पिस्टल में आपने सोना जीता, पर 10 मीटर में आप कामयाबी को दोहरा नहीं पाए?
जीतू - मेरे लिए दोनों में कोई ज्यादा आसान नहीं है, बल्कि दोनों इवेंट में मेरे प्रदर्शन अच्छे और समान रहे हैं। एशियाड की 10 मीटर इवेंट में मैं अच्छा खेल रहा था। लेकिन हुआ यह कि मेरे से पहले वाले शूटर (कोरियाई शूटर किम) ने 10.9 का बहुत अच्छा निशाना लगाया और इसके बाद तालियां बजने लगीं। ऐसे में, मेरा समय निकला जा रहा था। हर शॉट के लिए 50 सेकंड ही मिलते हैं। हड़बड़ाहट में मेरा रिदम टूट गया और मैं खराब खेल गया। पहले मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ। लेकिन इस बार हो गया। 50 मीटर इवेंट में मुझे सोना मिला, जबकि 10 मीटर में कांसा, पर मैं अब 10 मीटर पर ज्यादा मेहनत करूंगा।

क्या इन दो वर्गों से ही आपने अपने करियर की शुरुआत की थी?
जीतू - ऐसा नहीं है। फ्री पिस्टल (50 मीटर पिस्टल इवेंट इसी को कहते हैं) तो मुझे इतना अच्छा लगता ही नहीं था और स्पोर्ट पिस्टल (25 मीटर पिस्टल इवेंट) पसंद था। पिछले साल से मैंने फ्री पिस्टल पर अधिक ध्यान देना शुरू किया। हां, एयर पिस्टल मेरे लिए मास्टर इवेंट है। लेकिन अब दोनों में मेरा हाथ अच्छा चल रहा है। हार-जीत तो लगी रहती है।

नेपाल से इंचियोन तक के अपने सफर को आप कैसे देखते हैं?
पोडियम में गोल्ड मेडल के साथ जीतू
जीतू - यह कहिए कि भारत से इंचि.., जो नाम आपने लिया, वह मैं बोल ही नहीं पा रहा हूं। (हंसते हुए) वहां भी इसे बोलने की काफी कोशिशें कीं। भारत से सफर की बात कीजिए। नेपाल में मेरा जन्म हुआ। बाकी सब भारत में मिला है। लखनऊ अच्छा लगता है। वहीं कहीं घर लेकर बस जाऊंगा। 2006 में गोरखा रेजिमेंट नहीं ज्वॉइन करता, तो नेपाल में अपने गांव में खेती कर रहा होता। बहुत कष्ट मैंने झेले हैं। गिनाने बैठूं, तो शायद खत्म न हो। पर यह जानना चाहिए कि इस देश में काफी सारे लोग मुश्किलों से ही आगे बढ़े हैं। खैर, पढ़ने के लिए भाग-भागकर स्कूल जाता था और वहां क्या पढ़ना है और कैसे पढ़ना है, यह मुझे मालूम ही नहीं था। फिर घर लौटता, जो मिल जाता, उसे खाता और भैंस-बकरी चराने निकल जाता। 
      पापा से खूब फौज की कहानियां सुनता। उन्होंने लड़ाई लड़ी थी। बहादुरी के किस्से अच्छे लगते थे। नेपाल में काम के लिए बाहर जाना होता है। पापा को कहता था कि आपकी तरह मैं भी फौज में भर्ती होऊंगा। वैसे, यह देखने के लिए पापा रहे नहीं। मां वहीं खेती-बाड़ी करती है। मेरे से दो बड़े भाई अलग हो गए। एक बड़े भाई और एक छोटा, साथ में मां, हमलोग रहते हैं। 2006 में भारत और ब्रिटेन, दोनों की फौज में भर्ती खुली हुई थी। ब्रिटेन वाली भर्ती एक दिन बाद होनी थी। इससे पहले मेरा गोरखा रेजिमेंट में हो गया। भारत से पापा का ज्यादा जुड़ाव था। उनकी कहानियों में भारत होता था। मैंने यहीं आना पसंद किया। लखनऊ में मुझे ट्रेनिंग मिली। मैं जवान बन गया। इतना ही सोचा था, इस जिंदगी के लिए। यहां तक तो कभी नहीं सोचा कि नायब-सूबेदार बन जाऊंगा। यह सब शूटिंग से मिला है।

आपको 2010-11 में शूटिंग स्क्वॉड से वापस आर्मी यूनिट में भेजा गया था?
जीतू - हर बुरा अच्छे के लिए ही होता है। तब मेरा प्रदर्शन खराब था। लेकिन मैं अपनी गलतियों से सीखता गया और मेरी वापसी हुई। इस साल अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में मेरे प्रदर्शन काफी अच्छे रहे। 2014 में अब तक सात मेडल जीत चुका हूं।

अपनी इस कामयाबी का श्रेय किसे देना चाहेंगे?
जीतू - मां को। वह अब भी इटारी में ही है। उसे तो यह भी मालूम नहीं था कि मुझे गोल्ड मेडल मिला है। वल्र्ड चैंपियनशिप के लिए जाने के बाद से एशियाड तक मेरी उनसे बात नहीं हो पाई। इसलिए जब कोई यह कहता है कि किसकी पसंद से शादी करोगे, अपनी या मां की, तो मैं कहता हूं कि मां की पसंद से ही करूंगा।

शूटिंग में भारतीय इन्फ्रास्ट्रक्चर को आप कैसे आंकते हैं?
पोडियम में ब्रॉन्ज़ मेडल के साथ जीतू
जीतू - मुझे तो सब कुछ बढ़िया लगता है। इन्फ्रास्ट्रक्चर, ट्रेनिंग, फैसेलिटी, फौज में सब अच्छा है। फिटनेस और स्टेमिना पर वहां काफी काम होता है। इतनी सारी सुविधाएं तो मैंने कहीं और नहीं देखी। वीपेन भी एक से बढ़कर एक हैं। इसलिए खेल में फौज आगे है, देश आगे है। अब यह आदमी से आदमी पर निर्भर करता है कि वह इन सुविधाओं का कैसे फायदा उठा पाता है। वैसे भी सुविधाओं के न होने का रोना बुजदिलों का काम है।


आपका अगला निशाना क्या होगा?
जीतू - कोशिश तो यही रहेगी कि रियो ओलंपिक में भारत का नाम रोशन करूं। इस प्रदर्शन को बनाए रखना है और इसमें काफी सुधार भी लाना है। उससे पहले शूटिंग का वल्र्ड कप है। अब उसी पर सारा ध्यान लगाऊंगा।
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