Header Ads

बाइचुंग भूटिया: भाजपा बाद में, पहले मुकाबला गोरखाओं से

दार्जिलिंग : तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे पूर्व अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी बाइचुंग भूटिया जींस, टीशर्ट और जैकेट में कहीं से कहीं तक नेता नहीं लगते, लेकिन किसी मंजे हुए नेता की तरह ही भाषण देते दिखते हैं। वे लोगों से कहते हैं- वोट देने के लिए विरोधी पार्टी के लोग रुपए दें तो ले लेना, लेकिन वोट मुझे ही देना। भाषण जारी है और उनके सामने खड़े बच्चे ऑटोग्राफ के लिए इंतजार कर रहे हैं। अपनी बात खत्म करते ही भूटिया खुद बच्चों को अपने पास बुलाते हैं, ऑटोग्राफ देते हैं और चल पड़ते हैं। बच्चे खुश, लेकिन भूटिया के बारे में यहां के युवा क्या सोच रहे हैं? इसका जवाब युवती मिन्गमा शेरपा ने दिया। कहती हैं, बाइचुंग स्पोर्ट्समैन रहे हैं। उनके कमिटमेंट पर हम भरोसा कर सकते हैं।

नए-नए नेता बने भूटिया के लिए नई भूमिका किसी फुटबॉल मैच की ही तरह बेहद चुनौतीपूर्ण है। उनके सामने हैं भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्षएसएस आहलूवालिया, जिनके झंडे-बैनर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने उठा रखे हैं। यहां आपको चुनाव कार्यालय तो भाजपा के दिखेंगे, लेकिन वहां मिलेंगे मोर्चा के कार्यकर्ता। पृथक गोरखालैंड के मुद्दे पर मोर्चा ने भाजपा को समर्थन दिया है। पिछली बार भी मोर्चा भाजपा के साथ था और जसवंत सिंह जीते थे। असल में भूटिया का मुकाबला मोर्चा से ही है। यहां गोरखा के एक बड़े वर्ग में मोर्चा का प्रभाव है। इसलिए भूटिया का ध्यान पहाड़ी इलाकों के वोटरों पर है। वे लोगों से भावनात्मक रूप से जुडऩे की कोशिश करते हैं। नेपाली भाषा में बातचीत होती है। कहते हैं मैं आपके बीच का ही हूं, आपके बीच ही रहूंगा। बस, एक मौका दें, पांच साल बाद मुझसे एक खिलाड़ी का नहीं, नेता का हिसाब लेना।

राजनीति में आने पर
पॉलिटिक्स में इतनी जल्दी आ जाऊंगा, यह नहीं सोचा था। राजनीति फुटबॉल मैच की तरह आसान नहीं है, क्योंकि नेताओं ने झूठ बोल-बोलकर इसे जटिल बना दिया है। यहां मैं नया हूं, अभी सीख रहा हूं।

मोदी के बारे में
नि:संदेह देश में मोदी का नाम चल रहा है, इसकी वजह है कांग्रेस की नाकामी और घोटाले। वैसे भी मोदी और बीजेपी वेव्स क्रिएट करने में माहिर है, लेकिन हमारे इस क्षेत्र में मोदी का उतना प्रभाव नहीं है।

मुद्दों के बारे में
गोरखालैंड के नाम पर लोगों को अब तक धोखा ही मिला है। पिछला चुनाव भाजपा इसी मुद्दे पर जीती थी। विकास का तो नाम ही नहीं है। अब अहलुवालिया भी विकास के नाम पर वोट नहीं मांग रहे हैं।

बाइचुंग देश के पहले फुटबॉल खिलाड़ी रहे जो यूरोप के प्रोफेशनल क्लब से खेले। इंग्लिश क्लब ब्यूरी ने उनके साथ तीन वर्ष का करार किया था।

( दैनिक भास्कर )
Powered by Blogger.